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Monday 10 April 2017

वशीकरण मंत्र


भैरव वशीकरण मन्त्र
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१॰ “ॐनमो रुद्राय, कपिलाय, भैरवाय, त्रिलोक-नाथाय, ॐ ह्रीं फट् स्वाहा।”
विधिः- -: सर्व-प्रथम किसी रविवार  को दीपक, गुग्गुल, धूप सहित उपर्युक्त मन्त्र का पन्द्रह हजार जप कर उसे सिद्ध करे। फिर आवश्यकतानुसार इस मन्त्र का १०८, 108 बार जप कर एक लौंग को अभिमन्त्रित लौंग को, साध्य को खिलाए
३॰ “ॐ भ्रां भ्रां भूँ भैरवाय स्वाहा। ॐ भं भं भं अमुक-मोहनाय स्वाहा।”
विधिः:- उक्त मन्त्र को सात बार पढ़कर पीपल के पत्ते को अभिमन्त्रित करे। फिर मन्त्र को उस पत्ते पर लिखकर, जिसका वशीकरण करना हो, घर के पिछवाड़े गाड़ दे। या उसके घर में फेंक देवे। यही क्रिया ‘फुरहठ’ या ‘छितवन’ के पत्ते द्वारा भी हो सकती है।


मंत्र महायोग की शक्तिशाली दुनिया मे मंत्र की वो शक्ति अनुभव कर सकते है जिस से टूटता हुआ घर,दिल व समाज ये सब बच सकते है
इस मंत्र के चमत्‍कार से घर मे सुख और आनंद हो जाता है और आनंद की दात्री होती है घर की स्त्री अर्थात यदि घर मे पत्नी कलह करती हो या बार बार मायके जा कर बैठती हो या तलाक की बात करती हो या फिर पति को पत्नी अपेक्षित सहयोग ना मिलता हो , इस मंत्र का प्रयोग आवश्याही आपके लिये सफल सीध होगा।
मंत्र
मोहिनी माता भूत पिता भूत सिर बेताल उढ़ ए काली.............को जा लाग
एसी जाके लाग ..........को लग जाये हमारी मुहबत की आग
न खड़े सुख ना लेटे सुख न सोते सुख
सिन्दूर चढ़ाऔं मंगलवार कभी ना छोड़े हमारा ख्याल।
जब तक ना देखे हमारा मुख काया तड़प तड़प मर जाये
चलो मंत्र फुरो वाचा दिखाओ रे शब्द अपने गुरू के इलम का तमाशा
खाली जगह पर उस स्त्री का नाम ले जिसको आप वश मे करना चाहते हैं
यह मंत्र केवल शादी शुदा लोगो को ही लाभ देता है।




मां दुर्गा के मंत्र



मां दुर्गा

सामूहिक कल्याण के लिए मां दुर्गा की वंदना इस मंत्र के द्वारा करना चाहिए-

देव्या यया ततमिदं जग्दात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या |तामम्बिकामखिलदेव महर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ||

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इस मंत्र के द्वारा विश्व के अशुभ तथा भय का विनाश करने के लिए मां दुर्गा की स्तुति करना चाहिए-

यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तमलं बलं च |
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ||

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अपने पापों को मिटाने के लिये इस मन्त्र के द्वारा मां दुर्गा की अराधना करना चाहिए-

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् |
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योनः सुतानिव ||

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जीवन में आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए मां दुर्गा की आराधना इस मंत्र से करना चाहिए-

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् |
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||

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प्रसन्नता प्राप्ति के लिए मां दुर्गा की आराधना इस मंत्र के द्वारा करना चाहिए-

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि |
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ||

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भक्ति प्राप्ति के लिए मां दुर्गा की वंदना इस मंत्र के द्वारा करना चाहिए-

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे |
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||

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स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिए मां दुर्गा की स्तुति इस मंत्र के द्वारा करना चाहिए-

सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी |
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ||

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महामारी नाश के लिए मां दुर्गा की आराधना इस मंत्र के द्वारा करना चाहिए-
जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी |
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते ||

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विविध उपद्रवों से बचने के लिए मां दुर्गा की आराधना इस मंत्र का जाप करते हुए करना चाहिए-

रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र |दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम् ||


चौंसठ योगिनि


चौंसठ योगिनियों के नाम :- 

1.बहुरूप,              2.तारा,                 3.नर्मदा,                  4.यमुना,
5.शांति,                6.वारुणी              7.क्षेमंकरी,               8.ऐन्द्री,
9.वाराही,              10.रणवीरा,         11.वानर-मुखी,          12.वैष्णवी,
13.कालरात्रि,        14.वैद्य रूपा,       15.चर्चिका                16.बेतली,
 17.छिन्नमस्तिका,   18.वृषवाहन,    19.ज्वाला कामिनी,   20.घटवार,
 21.कराकाली,            22.सरस्वती,       23.बिरूपा,           24.कौवेरी,
 25.भलुका,               26.नारसिंही,        27.बिरजा,            28.विकतांना,
 29.महालक्ष्मी,          30.कौमारी,          31.महामाया         32.रति,
 33.करकरी,             34.सर्पश्या,           35.यक्षिणी,          36.विनायकी,
 37.विंध्यवासिनी,       38. वीर कुमारी,       39. माहेश्वरी,     40.अम्बिका,
 41.कामिनी,               42.घटाबरी,            43.स्तुती,            44.काली,
 45.उमा,                 46.नारायणी,            47.समुद्र                48.ब्रह्मिनी,
 49.ज्वाला मुखी,       50.आग्नेयी             , 51.अदिति,           52.चन्द्रकान्ति,
53.वायुवेगा,            54.चामुण्डा,               55.मूरति,              56.गंगा,
 57.धूमावती,             58.गांधार,               59.सर्व मंगला,         60.अजिता,
61.सूर्यपुत्री                62.वायु वीणा,             63.अघोर              64. भद्रकाली।

प्रमुख रूप से आठ योगिनियां हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं:-

 1.सुर-सुंदरी योगिनी,                      2.मनोहरा योगिनी,
3.  कनकवती योगिनी,                     4.कामेश्वरी योगिनी
, 5. रति सुंदरी योगिनी,                     6. पद्मिनी योगिनी,
7. नतिनी योगिनी और                     8. मधुमती योगिनी।  


समस्त योगिनियां अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं तथा इंद्रजाल, जादू, वशीकरण, मारण, स्तंभन इत्यादि कर्म इन्हीं की कृपा द्वारा ही सफल हो पाते हैं  

Wednesday 15 March 2017

जटा बांधने का मंत्र

साधुओ का जटा बांधने का मंत्र 

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साधुओ का जटा

जटा ( साधुओ के सिर के बाल  ) साधुओ की एक मुख्य पहचान है , उसके साथ भी कई पहलु जुड़े होते है | कोई उसे जिंदगी भर के लिए धारण कर्ता है, कोई बारह साल तक ,या किसी निश्चित समय के लिए |
निश्चित समय के लिए रखी गई जटा का प्रत्यर्पण कुम्भ के मेले में किया जाता है | जटा को बांधने के लिए लिए नाथ साधुओ में मंतर प्रचलित है | जो की इस प्रकार है |
 

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साधुओ का जटा

सत नमो आदेश ,गुरु जी को आदेश , ओमगुरुजी नीली पिली सिर जटा , जटा रमाई पाताल गंगा नाम शतानि शिवजटा ,अनन्त जटा भुजा पसर |नाम सहस्त्रेण विष्णु ब्रह्मा , भेव जटा का शिव शंकर पाया |अगन प्रजाले ब्रह्माजी बैठे , जटा अगन में होमे काया |तापी जटा तापी काया , तक महादेव बन्दा पाया  |उरम धुरम सिर  जटा ज्वाला ,सिर उनमन पलटे पारा |अह्नाद नाद बजे हमारा  ,सिद्ध नाथ श्री गोरखजी ने कहाया |शब्द का सुच्चा , गुरां का बन्दा . गुरुप्रसाद जटा जमाया |काम क्रोध त्यागे माया ,अक्षय योगी सबसे न्यारा |बिना मंत्र पढ़ जटा जमाया , सो योगी नरक समाया |मंत्र पढ़ जटा समाया , सो योगी जटा शिवपुरी में बासा |इतना जटा जप सम्पूर्ण भया |श्री नाथ गुरूजी को आदेश | आदेश | आदेश |

Tuesday 7 March 2017

शिव मानस पूजा

Shiv ji

|| शिव स्तुति ||

महादेव शिव शंकर शम्भू की महिमा अपरंपार है , देव वर्ग में वे सहज भाव से ही प्रसन्न होने वाले माने जाते है | उनके मानस पूजा स्त्रोत्र में उनकी मानसिक रूप से स्तुति का विधान दिया गया है | यह उन स्थितियों के लिए है जब भक्त का मन शिव पूजन का हो, लेकिन   आस पास कोई शिव मंदिर या शिवलिंग स्थापित ना हो | इस स्त्रोत्र के कारण एक ऋषि का  कारागार में होते हुए उद्धार हो गया था |

रत्नैः कल्पितमानसं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं।
नाना रत्न विभूषितम्‌ मृग मदामोदांकितम्‌ चंदनम॥
जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा।
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितम्‌ गृह्यताम्‌॥1


भावार्थ - मैं अपने मन में ऐसी भावना करता हूं कि हे पशुपति देव! संपूर्ण रत्नों से निर्मित इस सिंहासन पर आप विराजमान होइए। हिमालय के शीतल जल से मैं आपको स्नान करवा रहा हूं। स्नान के उपरांत रत्नजड़ित दिव्य वस्त्र आपको अर्पित है। केसर-कस्तूरी में बनाया गया चंदन का तिलक आपके अंगों पर लगा रहा हूं। जूही, चंपा, बिल्वपत्र आदि की पुष्पांजलि आपको समर्पित है। सभी प्रकार की सुगंधित धूप और दीपक मानसिक प्रकार से आपको दर्शित करवा रहा हूं, आप ग्रहण कीजिए।


सौवर्णे नवरत्न खंडरचिते पात्र घृतं पायसं।भक्ष्मं पंचविधं पयोदधि युतं रम्भाफलं पानकम्‌॥शाका नाम युतं जलं रुचिकरं कर्पूर खंडौज्ज्वलं।ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥2॥


भावार्थ : मैंने नवीन स्वर्णपात्र, जिसमें विविध प्रकार के रत्न जड़ित हैं, में खीर, दूध और दही सहित पांच प्रकार के स्वाद वाले व्यंजनों के संग कदलीफल, शर्बत, शाक, कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मृदु जल एवं ताम्बूल आपको मानसिक भावों द्वारा बनाकर प्रस्तुत किया है। हे कल्याण करने वाले! मेरी इस भावना को स्वीकार करें।


छत्रं चामर योर्युगं व्यंजनकं चादर्शकं निर्मलं।
वीणा भेरि मृदंग काहलकला गीतं च नृत्यं तथा॥
साष्टांग प्रणतिः स्तुति-र्बहुविधा ह्येतत्समस्तं ममा।
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥3॥



हे भगवन, आपके ऊपर छत्र लगाकर चंवर और पंखा झल रहा हूं। निर्मल दर्पण, जिसमें आपका स्वरूप सुंदरतम व भव्य दिखाई दे रहा है, भी प्रस्तुत है। वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभि आदि की मधुर ध्वनियां आपकी प्रसन्नता के लिए की जा रही हैं। स्तुति का गायन, आपके प्रिय नृत्य को करके मैं आपको साष्टांग प्रणाम करते हुए संकल्प रूप से आपको समर्पित कर रहा हूं। प्रभो! मेरी यह नाना विधि स्तुति की पूजा को कृपया ग्रहण करें।


आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः॥
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्‌॥4॥



- हे शंकरजी, मेरी आत्मा आप हैं। मेरी बुद्धि आपकी शक्ति पार्वतीजी हैं। मेरे प्राण आपके गण हैं। मेरा यह पंच भौतिक शरीर आपका मंदिर है। संपूर्ण विषय भोग की रचना आपकी पूजा ही है। मैं जो सोता हूं, वह आपकी ध्यान समाधि है। मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है। मेरी वाणी से निकला प्रत्येक उच्चारण आपके स्तोत्र व मंत्र हैं। इस प्रकार मैं आपका भक्त जिन-जिन कर्मों को करता हूं, वह आपकी आराधना ही है


- कर चरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्‌।विहितमविहितं वा  जय जय करणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥5॥


हे परमेश्वर! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मन से अभी तक जो भी अपराध किए हैं। वे विहित हों अथवा अविहित, उन सब पर आपकी क्षमापूर्ण दृष्टि प्रदान कीजिए। हे करुणा के सागर भोले भंडारी श्री महादेवजी, आपकी जय हो। जय हो।

Tuesday 14 February 2017

शिवरात्रि व्रत कथा , व्रत रखने , उद्यापन करने का विधान ( Shivratri special )



https://shabarmantars.blogspot.in/2017/02/shivratri-special.html शिवरात्रि की कथा , व्रत रखने , उद्यापन करने का विधान





समुद्र मंथन की कथा धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन (ऐश्वर्य, धन, वैभव आदि) हो गया। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया और ये भी बताया कि समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा, जिसे ग्रहण कर तुम अमर हो जाओगे। यह बात जब देवताओं ने असुरों के राजा बलि को बताई तो वे भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। वासुकि नाग की नेती बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया। समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी, भगवान धन्वन्तरि सहित 14 रत्न निकले।

शिवरात्रि व्रत कथा , व्रत रखने , उद्यापन करने का विधान https://shabarmantars.blogspot.in/2017/02/shivratri-special.html

समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण कर लिया।, सब देवी देवता डर गये कि अब दुनिया तबाह हो जायेगी| इस समस्या को लेकर सब देवी देवता शिव जी के पास गये, शिव ने वह जहर पी लिया और अपने गले तक रखा, निगला नही,शिव का गला नीला हो गया और उसे नीलकंठ का नाम दिया गया| शिव ने दुनिया को बचा लिया, शिवरात्रि इसलिये भी मनाई जाती है| सबसे बड़ी शिवरात्रि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी होती है। इसे महाशिवरात्रि भी कहा जाता है।पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन महाशिवरात्रि, उसके बाद सावन के महीने में आनेवाला प्रत्येक सोमवार, फिर हर महीने आनेवाली शिवरात्रि और सोमवार का महत्व है। लेकिन भगवान को सावन यानी श्रावण का महीना बेहद प्रिय है जिसमें वह अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं।

हलाहल विष देवताओं और असुरों द्वारा मिलकर किये गए समुद्र मंथन के समय निकला था। मंथन के फलस्वरूप जो चौदह मूल्यवान वस्तुएँ प्राप्त हुई थीं, उनमें से हलाहल विष सबसे पहले निकला था।






शिवरात्रि के व्रत की कथा


गुरुद्रुह शिकारी

एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गाँव में एक गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।


 शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।




पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं
, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने
 धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी,
 तब तुम मुझे मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी 
और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।





कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।'शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।'


शिवरात्रि व्रत कथा , व्रत रखने , उद्यापन करने का विधान https://shabarmantars.blogspot.in/2017/02/shivratri-special.html

शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।'उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।'मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।




शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।'मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'




उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।'


शिवरात्रि व्रत को कहर पहरो में करने का विधान (तरीका )

प्रातः काल मे उठकर नित्य कर्मकरने के बाद शिव मंदिर में जाकर बह्ग्वान शिव शंकर की स्तुति करते हुए प्रार्थना करे कि हे महादेव मैं आपका व्रत करने का इच्छुक हूँ  , आप मेरे इस व्रत को सफल होने तथा इस व्रत को करने की आज्ञा दे | और सभी प्रकार के विघ्नों से मेरी रक्षा करे | इसके बाद दश या सोलह उपचारो से शिवलिंग की पूजा करे | यदि नजदीक कोई शिवलिंग न हो तो पार्थिव शिवलिंग का निर्माण  किया जा सकता है | व्रती को चाहिए कि शिव महिमा को पढ़े या सुने | शिवरात्रि को जागरण भी किया जाना शुभ होता है | 

पहले पहर की पूजा का विधान 

सबसे पहले  दश या सोलह उपचारो से शिवलिंग की पूजा करे |इसमें तिल , चावल , गंगा जल ,फूल , चन्दन , धतूरा , भांग , बेलपत्र इत्यादि से हो सकते है | इसके बाद महादेव का पूजन कर पकवानों का भोग लगाए |फिर शिव के सामने भूखो  को भोजन करने का संकल्प ले  ( सामर्थ्य के अनुसार ) | इसके बाद के समय को शिव महिमा का गुणगान करते हुए बिताये |

 दूसरे पहर की पूजा का विधान 

पूजा करने का  वही विधान है | लेकिन इसमें कमल के फूल , तथा जौ की संख्या पहले से दोगुनी होनी चाहिए या जौ का चूरमा चढ़ाना चाहिए | ॐ नमः शिवायः का लगातार जप करे |

तीसरे  पहर की पूजा का विधान

तीसरे  पहर की पूजा में  भी पूजा करने का  वही विधान है | गेंहू का चूरमा चढ़ाना चाहिए साथ में मदार या आक के फूल तीसरे पहर की पूजा में आवश्यक माने गए है |

चौथे  पहर की पूजा का विधान

दश या सोलह उपचारो से शिवलिंग की पूजा करे | मुख्य मिठाइयां , मुंग या उडद का चूरमा चढ़ाना लाभदायक माना गया है | इसके अलावा फलो के रास को भी महत्व दिया गया है |

चौथे पहर में बेलपत्रों को अनगिनत संख्या में चढ़ाना फलदायक होता है | बाकि बचा समय शिव जी गुणगान करने में लगाए | 

शिवरात्रि व्रत को पहरो में करने का विधान (तरीका )

प्रातः काल मे उठकर नित्य कर्मकरने के बाद शिव मंदिर में जाकर बह्ग्वान शिव शंकर की स्तुति करते हुए प्रार्थना करे कि हे महादेव मैं आपका व्रत करने का इच्छुक हूँ  , आप मेरे इस व्रत को सफल होने तथा इस व्रत को करने की आज्ञा दे | और सभी प्रकार के विघ्नों से मेरी रक्षा करे | इसके बाद दश या सोलह उपचारो से शिवलिंग की पूजा करे | यदि नजदीक कोई शिवलिंग न हो तो पार्थिव शिवलिंग का निर्माण  किया जा सकता है | व्रती को चाहिए कि शिव महिमा को पढ़े या सुने | शिवरात्रि को जागरण भी किया जाना शुभ होता है | 

पहले पहर की पूजा का विधान 

सबसे पहले  दश या सोलह उपचारो से शिवलिंग की पूजा करे |इसमें तिल , चावल , गंगा जल ,फूल , चन्दन , धतूरा , भांग , बेलपत्र इत्यादि से हो सकते है | इसके बाद महादेव का पूजन कर पकवानों का भोग लगाए |फिर शिव के सामने भूखो  को भोजन करने का संकल्प ले  ( सामर्थ्य के अनुसार ) | इसके बाद के समय को शिव महिमा का गुणगान करते हुए बिताये |

 दूसरे पहर की पूजा का विधान 

पूजा करने का  वही विधान है | लेकिन इसमें कमल के फूल , तथा जौ की संख्या पहले से दोगुनी होनी चाहिए या जौ का चूरमा चढ़ाना चाहिए | ॐ नमः शिवायः का लगातार जप करे |

तीसरे  पहर की पूजा का विधान

तीसरे  पहर की पूजा में  भी पूजा करने का  वही विधान है | गेंहू का चूरमा चढ़ाना चाहिए साथ में मदार या आक के फूल तीसरे पहर की पूजा में आवश्यक माने गए है |

चौथे  पहर की पूजा का विधान

दश या सोलह उपचारो से शिवलिंग की पूजा करे | मुख्य मिठाइयां , मुंग या उडद का चूरमा चढ़ाना लाभदायक माना गया है | इसके अलावा फलो के रास को भी महत्व दिया गया है |चौथे पहर में बेलपत्रों को अनगिनत संख्या में चढ़ाना फलदायक होता है | बाकि बचा समय शिव जी गुणगान करने में लगाए



शिवरात्रि व्रत का उद्यापन करने का विधान 

शास्त्रो के अनुसार  शिवरात्रि का व्रत चौदह साल तक करना चाहिए ,पंद्रहवे साल में इसका उद्यापन करना चाहिए |

विधि यह है -
त्रयोदशी के दिन संयमपूर्वक रहे तथा चतुर्दर्शी के दिन निर्जल व्रत धारण करने का विधान है | किसी शिवालय में या घर में ही दिव्य मंडल की रचना करे | मंडल के मध्य में सर्वतोभद्र चक्र का निर्माण करे | अक्षत से निर्माण करना फलदायक होता है | इसके बाद आठ लिंगतोभद्र कैनक्रो पर आठ कलशों की प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए | इसके बाद फूल तथा वस्त्रो से अलंकरण करना चाहिए | कलश के ऊपर शिव पार्वती की नंदी सहित प्रतिमा स्थापना करनी चाहिए | रात्रि में चारो पहर महादेव का षदोषोचार से पूजन करना चाहिए | रात बाहर शिव स्तुति करे | सुबह को स्नान करके षोडशोचार पूजन करे | योग्य विद्वान से पूजा सम्पन कराये | जरूरतमंदों को भोजन ,वस्त्र , आभूषण इत्यादि का दान करे |  सबसे अधिक अपने पुरोहित को दान दे | फिर उनकी आज्ञा से परिवार सहित भोजन करे | इस तरीके से व्रत का उद्यापन करना चहिये | 

Tuesday 31 January 2017

माता सरस्वती की कथा , मंत्र, वसंत पंचमी पर्व


माता सरस्वती 



माता सरस्वती 

कथा प्रसंग 1:

माँ सरस्वती के एक मुख, चार हाथ हैं। सरस्वती का जन्म ब्रह्मा के मुँह से हुआ था। मुस्कान से उल्लास, दो हाथों में वीणा-भाव संचार एवं कलात्मकता की प्रतीक है। पुस्तक से ज्ञान और माला से ईशनिष्ठा-सात्त्विकता का बोध होता है। वाहन मयूर-सौन्दर्य एवं मधुर स्वर का प्रतीक है। इनका वाहन हंस माना जाता है और इनके हाथों में वीणा, वेद और माला होती है। भारत में कोई भी शैक्षणिक कार्य के पहले इनकी पूजा की जाती हैं। ये ब्रह्मा की स्त्री हैं।सरस्वती माँ के अन्य नामों में शारदा, शतरूपा, वीणावादिनी, वीणापाणि, वाग्देवी, वागेश्वरी,वाणी, भारतीशुक्लवर्ण, श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणावादनतत्परा तथा श्वेतपद्मासना आदि कई नामों से जाना जाता है।

कथा प्रसंग 2:

विद्या की यह देवी बेहद खूबसूरत और आकर्षक थीं कि स्वयं ब्रह्मा भी सरस्वती के आकर्षण से खुद को बचाकर नहीं रख पाए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने पर विचार करने लगे | सरस्वती ने अपने पिता की इस मनोभावना को भांपकर उनसे बचने के लिए चारो दिशाओं में छिपने का प्रयत्न किया लेकिन उनका हर प्रयत्न बेकार साबित हुआ। इसलिए विवश होकर उन्हें अपने पिता के साथ विवाह करना पड़ा।ब्रह्मा और सरस्वती करीब 100 वर्षों तक एक जंगल में पति-पत्नी की तरह रहे। इन दोनों का एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम रखा गया था स्वयंभु मनु।

कथा प्रसंग 3:

मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा अपनी ही बनाई हुई रचना, सरवस्ती के प्रति आकर्षित होने लगे और लगातार उन पर अपनी दृष्टि डाले रखते थे। ब्रह्मा की दृष्टि से बचने के लिए सरस्वती चारो दिशाओं में छिपती रहीं लेकिन वह उनसे नहीं बच पाईं। इसलिय सरस्वती आकाश में जाकर छिप गईं लेकिन अपने पांचवें सिर से ब्रह्मा ने उन्हें आकाश में भी खोज निकाला और उनसे सृष्टि की रचना में सहयोग करने का निवेदन किया।सरस्वती से विवाह करने के पश्चात सर्वप्रथम मनु का जन्म हुआ। ब्रह्मा और सरस्वती की यह संतान मनु को पृथ्वी पर जन्म लेने वाला पहला मानव कहा जाता है।

कथा प्रसंग 4:

लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा नारायण के निकट निवास करती थीं। एक बार गंगा ने नारायण के प्रति अनेक कटाक्ष किये। नारायण तो बाहर चले गये किन्तु इससे सरस्वती रुष्ट हो गयी। सरस्वती को लगता था कि नारायण गंगा और लक्ष्मी से अधिक प्रेम करते हैं। लक्ष्मी ने दोनों का बीच-बचाव करने का प्रयत्न किया। सरस्वती ने लक्ष्मी को निर्विकार जड़वत् मौन देखा तो जड़ वृक्ष अथवा सरिता होने का शाप दिया। सरस्वती को गंगा की निर्लज्जता तथा लक्ष्मी के मौन रहने पर क्रोध था। उसने गंगा को पापी जगत का पाप समेटने वाली नदी बनने का शाप दिया। गंगा ने भी सरस्वती को मृत्युलोक में नदी बनकर जनसमुदाय का पाप प्राक्षालन करने का शाप दिया। तभी नारायण भी वापस आ पहुँचे। उन्होंने सरस्वती का आर्लिगन कर उसे शांत किया तथा कहा—“एक पुरुष अनेक नारियों के साथ निर्वाह नहीं कर सकता। परस्पर शाप के कारण तीनों को अंश रूप में वृक्ष अथवा सरिता बनकर मृत्युलोक में प्रकट होना पड़ेगा। लक्ष्मी! तुम एक अंश से पृथ्वी पर धर्म-ध्वज राजा के घर अयोनिसंभवा कन्या का रूप धारण करोगी, भाग्य-दोष से तुम्हें वृक्षत्व की प्राप्ति होगी। मेरे अंश से जन्मे असुरेंद्र शंखचूड़ से तुम्हारा पाणिग्रहण होगा। भारत में तुम ‘तुलसी’ नामक पौधे तथा पदमावती नामक नदी के रूप में अवतरित होगी। किन्तु पुन: यहाँ आकर मेरी ही पत्नी रहोगी। गंगा, तुम सरस्वती के शाप से भारतवासियों का पाप नाश करने वाली नदी का रूप धारण करके अंश रूप से अवतरित होगी। तुम्हारे अवतरण के मूल में भागीरथ की तपस्या होगी, अत: तुम भागीरथी कहलाओगी। मेरे अंश से उत्पन्न राजा शांतनु तुम्हारे पति होंगे। अब तुम पूर्ण रूप से शिव के समीप जाओ। तुम उन्हीं की पत्नी होगी। सरस्वती, तुम भी पापनाशिनी सरिता के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होगी। तुम्हारा पूर्ण रूप ब्रह्मा की पत्नी के रूप में रहेगा। तुम उन्हीं के पास जाओ।’’ उन तीनों ने अपने कृत्य पर क्षोभ प्रकट करते हुए शाप की अवधि जाननी चाही। कृष्ण ने कहा—“कलि के दस हज़ार वर्ष बीतने के उपरान्त ही तुम सब शाप-मुक्त हो सकोगी।’’ सरस्वती ब्रह्मा की प्रिया होने के कारण ब्राह्मी नाम से विख्यात हुई।

कथा प्रसंग 5:

सृष्टि निर्माण का काम पूरा होने के बाद एक दिन पवित्र उद्देश्य को पूरा करने के लिए ब्रह्मा जी ब्रह्मलोक से निलकर पृथ्वी पर पधारे। पृथ्वी पर आकर इन्होंने सबसे उत्तम मुहूर्त में यज्ञ का आयोजन किया। लेकिन एक समस्या यह थी कि बिना पत्नी के यज्ञ पूरा नही हो सकता था। ब्रह्मा जी शुभ मुहूर्त को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहते थे। इसलिए संसार के कल्याण हेतु एक ऐसी कन्या से विवाह कर लिया जो बुद्धिमान होने के साथ ही शास्त्रों का भी ज्ञान रखती थीं। इस कन्या का नाम शास्त्रों और पुराणों में गायत्री बताया गया। गायत्री से विवाह करने के बाद ब्रह्मा जी ने यज्ञ करना शुरु कर दिया। देवी सरस्वती ब्रह्मा जी को तलाश करते हुए तीर्थ नगरी पुष्कर में पहुंची जहां ब्रह्मा जी गायत्री के साथ यज्ञ कर रहे थे। ब्रह्मा जी के साथ दूसरी स्त्री को देखकर देवी सरस्वती क्रोधित हो उठी और ब्रह्मा जी को शाप दे दिया कि कि पृथ्वी के लोग ब्रह्मा को भुला देंगे और कभी इनकी पूजा नहीं होगी। किन्तु अन्य देवताओं की प्रार्थना पर सरस्वती का क्रोध कम हुआ और उन्होने कहा कि ब्रह्मा जी केवल पुष्कर में पूजे जाएंगे।

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शिक्षा व् अध्ययन के क्षेत्र काम कर रहे लोगो, विद्यार्थियों को माता सरस्वती की आराधना करनी चाहिए |
वे लोग जो मंदबुद्धि है ,जिन्हें भूलने की बीमारी है ,उन्हें भी माता सरस्वती की पूजा करनी चाहिए |


माता सरस्वती 

मां सरस्वती का श्र्लोक :-


पहले ॐ गं गणपतये नम: मन्त्र का जाप करें। 

ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।। कोटिचंद्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्।
वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम्।।  रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्।
सुपूजितां सुरगणैब्रह्मविष्णुशिवादिभि:।।

 वन्दे भक्तया वन्दिता च मुनीन्द्रमनुमानवै:।

देवी सरस्वती का मूल मंत्र है : -

'शारदा शारदाभौम्वदना। वदनाम्बुजे।सर्वदा सर्वदास्माकमं सन्निधिमं सन्निधिमं क्रिया तू।'

अन्य सरस्वती देवी के मंत्र 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नम:|
ॐ श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा।
ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।
ॐ महाविद्यायै नम: |
ॐ वाग्देव्यै नम: |
ॐ ज्ञानमुद्रायै नम: |

 सरस्वती देवी की स्तुति 

या कुंदेंदुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमंडितकरा या श्वेतपद्मासना !
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ! 

अर्थ :-

जो चन्द्रमा समान मुखमंडल लिए, हिम जैसे श्वेत कुंद फूलों के हार और शुभ्र वस्त्रों से अलंकृत हैं ,जो हाथों में श्रेष्ठ वीणा लिए श्वेत कमल पर विराजमान हैं,ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि देवगण भी जिनकी सदैव स्तुति करते हैं ,हे मां भगवती सरस्वती, आप मेरी सारी मानसिक जड़ता को दूर करो,हे सर्वत्र-विद्यमान विद्या देवी, आपको मेरा बार-बार नमस्कार |


सरस्वती माता का रक्षा मंत्र तथा स्तुति 

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

अर्थ :-

जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥
शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ॥



माता सरस्वती 

सरस्वती मंत्र


सरस्वती मंत्र  बीज मंत्र " ऐं " है।

 द्वयक्षर सरस्वती मंत्र -  

1. आं लृं  2. ऐं लृं

 त्र्यक्षर सरस्वती मंत्र -     

ऐं रुं स्वों।

चतुर्क्षर सरस्वती मंत्र 

ॐ ऐं नमः।

नवाक्षर सरस्वती मंत्र -

ॐ ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः

 दशाक्षर सरस्वती मंत्र -

1. - वद वद वाग्वादिन्यै स्वाहा
2.- ह्रीं ॐ ह्रसौं ॐ सरस्वत्यै नमः।

एकादशाक्षर सरस्वती मंत्र -

ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः।


एकादशाक्षर-चिन्तामणि-सरस्वती मंत्र -

ॐ ह्रीं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः।


एकादशाक्षर-पारिजात-सरस्वती मंत्र

1.- ॐ ह्रीं ह्सौं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः |
2.- ॐ ऐं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः।


द्वादशाक्षर सरस्वती मंत्र -

ह्रीं वद वद वाग्-वादिनि स्वाहा ह्रीं


अन्तरिक्ष-सरस्वती मंत्र-

ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष-सरस्वती स्वाहा।


षोडशाक्षर सरस्वती मंत्र

ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा।
सरस्वती महाभागे विद्ये कमल लोचने।
विद्यारूपे विशालाक्षी विद्या देहि नमोस्तुते !



सरस्वती माता का शाबर मंत्र -


" ॐ नमो सरस्वती विद्या नमो कंठ विराजो
आप भुला अक्षर कंठ करें हृदय विराजो आप
ॐ नमो स्वः ठ:ठ:ठ:  "


Monday 30 January 2017

भगवान शिव के बारे में जानकारी जो शायद आप नही जानते



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भगवान शिव 


भगवान शिव के बारे में जानकारी जो शायद आप नही जानते -

वशीकरण मंत्र  , रक्षा मंत्र , शक्ति मंत्र ,रोग नाशक मंत्र ,शांति के मंत्र , साधुओ के लिए  , ज्ञान वर्धक धार्मिक जानकारी के लिए visit  करे शाबर मंत्र या खोले shabarmantars.blogspot.in


भगवान शिव का नाम दिमाग में आते ही  मस्तिष्क पटल पर एक छवि उभरती है। एक छवि जिसके हाथ में डमरू-त्रिशूल, गले में साँप और समीप नंदी ( एक बैल ) का रूप उभर कर आता है |  । वस्त्र के नाम पर पशु चर्म है। ये छवि  जिसने  सदियों से लोगों को प्रभावित किया हुआ है । जटाओं में एक चंद्र चिह्न होता है। उनके मस्तष्क पर तीसरी आंख है। वे गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। उनके एक हाथ में डमरू तो दूसरे में त्रिशूल है। वे संपूर्ण देह पर भस्म लगाए रहते हैं। उनके शरीर के निचले हिस्से को वे व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं। वे वृषभ की सवारी करते हैं |

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भगवान शिव की जटाओ में गंगा 

भगवान शिव की जटाओ में गंगा जी का वास है ,  जानिए  इसका क्या कारण है -

भगीरथ बड़े प्रजावत्सल नरेश थे किन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं हुई। इस पर वे अपने राज्य का भार मन्त्रियों को सौंपकर स्वयं गंगावतरण के लिये गोकर्ण नामक तीर्थ पर जाकर कठोर तपस्या करने लगे। उनकी अभूतपूर्व तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वर माँगने के लिये कहा। भगीरथ ने ब्रह्मा जी से कहा कि हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यह वर दीजिये कि सगर के पुत्रों को मेरे प्रयत्नों से गंगा का जल प्राप्त हो जिससे कि उनका उद्धार हो सके। इसके अतिरिक्त मुझे सन्तान प्राप्ति का भी वर दीजिये ताकि इक्ष्वाकु वंश नष्ट न हो। ब्रह्मा जी ने कहा कि सन्तान का तेरा मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा, किन्तु तुम्हारे माँगे गये प्रथम वरदान को देने में कठिनाई यह है कि जब गंगा जी वेग के साथ पृथ्वी पर अवतरित होंगीं तो उनके वेग को पृथ्वी संभाल नहीं सकेगी। गंगा जी के वेग को संभालने की क्षमता महादेव जी के अतिरिक्त किसी में भी नहीं है। इसके लिये तुम्हें महादेव जी को प्रसन्न करना होगा। इतना कह कर ब्रह्मा जी अपने लोक को चले गये। "भगीरथ ने साहस नहीं छोड़ा। वे एक वर्ष तक पैर के अँगूठे के सहारे खड़े होकर महादेव जी की तपस्या करते रहे। केवल वायु के अतिरिक्त उन्होंने किसी अन्य वस्तु का भक्षण नहीं किया। अन्त में इस महान भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव जी ने भगीरथ को दर्शन देकर कहा कि हे भक्तश्रेष्ठ! हम तेरी मनोकामना पूरी करने के लिये गंगा जी को अपने मस्तक पर धारण करेंगे। इसकी सूचना पाकर विवश होकर गंगा जी को सुरलोक का परित्याग करना पड़ा। उस समय वे सुरलोक से कहीं जाना नहीं चाहती थीं, इसलिये वे यह विचार करके कि मैं अपने प्रचण्ड वेग से शिव जी को बहा कर पाताल लोक ले जाऊँगी वे भयानक वेग से शिव जी के सिर पर अवतरित हुईं। गंगा का यह अहंकार महादेव जी से छुपा न रहा। महादेव जी ने गंगा की वेगवती धाराओं को अपने जटाजूट में उलझा लिया। गंगा जी अपने समस्त प्रयत्नों के बाद भी महादेव जी के जटाओं से बाहर न निकल सकीं। गंगा जी को इस प्रकार शिव जी की जटाओं में विलीन होते देख भगीरथ ने फिर शंकर जी की तपस्या की। भगीरथ के इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने गंगा जी को हिमालय पर्वत पर स्थित बिन्दुसर में छोड़ा।



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भगवान शंकर के माथे पर चंद्र का स्थान क्यों है -

भगवान शंकर के माथे पर चंद्र का स्थान क्यों है -

पौराणिक कथानुसार चंद्र का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 नक्षत्र कन्याओं के साथ संपन्न हुआ। चंद्र एवं रोहिणी बहुत खूबसूरत थीं एवं चंद्र का रोहिणी पर अधिक स्नेह देख शेष कन्याओं ने अपने पिता दक्ष से अपनादु:ख प्रकट किया। दक्ष स्वभाव से ही क्रोधी प्रवृत्ति के थे और उन्होंने क्रोध में आकर चंद्र को श्राप दिया कि तुम क्षय रोग से ग्रस्त हो जाओगे। शनै:-शनै: चंद्र क्षय रोग से ग्रसित होने लगे और उनकी कलाएं क्षीण होना प्रारंभ प्रारंभ हो गईं। नारदजी ने उन्हें मृत्युंजय भगवान आशुतोष की आराधना करने को कहा, तत्पश्चात उन्होंंने भगवान आशुतोष की आराधना की। चंद्र अंतिम सांसें गिन रहे थे (चंद्र की अंतिम एकधारी) कि भगवान शंकर ने प्रदोषकाल में चंद्र को पुनर्जीवन का वरदान देकर उसे अपने मस्तक पर धारण कर लिया |



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भगवान शिव का सेवक वासुकी -


भगवान शिव का सेवक वासुकी -

शंकर जी के गले के आभूषण सांप है | उस नाग का नाम वासुकि है | कथा के अनुसार वासुकि की तपस्या से खुश होकर शिव जी ने वासुकि को अपने गले में आभूषण के तौर पर स्वीकार किया था |शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नागकुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। नागों के प्रारंभ में 5 कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकी, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक।

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भभूत या भस्म 

भभूत या भस्म -

- शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है। भस्म आकर्षण, मोह आदि से मुक्ति का प्रतीक भी है। देश में एकमात्र जगह उज्जैन के महाकाल मंदिर में शिव की भस्म आरती होती है जिसमें श्मशान की भस्म का इस्तेमाल किया जाता है।

त्रिपुंड तिलक

त्रिपुंड तिलक -

माथे पर भगवान शिव त्रिपुंड तिलक लगाते हैं। यह तीन लंबी धारियों वाला तिलक होता है। यह त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक है। यह सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक भी है। यह त्रिपुंड सफेद चंदन का या भस्म का होता है।

कान में कुंडल -

 कर्ण छेदन एक संस्कार है। शैव, शाक्त और नाथ संप्रदाय में दीक्षा के समय कान छिदवाकर उसमें मुद्रा या कुंडल धारण करने की प्रथा है। कर्ण छिदवाने से कई प्रकार के रोगों से तो बचा जा ही सकता है साथ ही इससे मन भी एकाग्र रहता है।

https://shabarmantars.blogspot.in/search?q=RUDRAKSHरुद्राक्ष -

 माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आंसुओं से हुई थी। धार्मिक ग्रंथानुसार 21 मुख तक के रुद्राक्ष होने के प्रमाण हैं, परंतु वर्तमान में 14 मुखी के पश्चात सभी रुद्राक्ष अप्राप्य हैं। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है तथा रक्त प्रवाह भी संतुलित रहता है।


http://shabarmantars.blogspot.com/2017/01/blog-post_30.htmlशिव गण -

 भगवान शिव की सुरक्षा और उनके आदेश को मानने के लिए उनके गण सदैव तत्पर रहते हैं। प्रमुख गण थे- भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। उनके गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है। उसके बाद नंदी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र। जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। भैरव दो हैं- काल भैरव और बटुक भैरव। दूसरी ओर वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। शिव ने अपनी जटा से 'वीरभद्र' नामक गण उत्पन्न किया। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं |



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शिव का धनुष -


 शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवरात को सौंप दिया गया था।

http://shabarmantars.blogspot.com/2017/01/blog-post_30.htmlशिव का चक्र -

 शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु था। इस तरह भगवान शिव के पास कई अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन उन्होंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र देवताओं को सौंप दिए। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था।





http://shabarmantars.blogspot.com/2017/01/blog-post_30.htmlशिव का त्रिशूल-

 शिव का त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है। इसमें 3 तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन। इसके अलावा पाशुपतास्त्र भी शिव का अस्त्र है।




शिव के द्वारपाल -

 कैलाश पर्वत के क्षेत्र में उस काल में कोई भी देवी या देवता, दैत्य या दानव शिव के द्वारपाल की आज्ञा के बगैर अंदर नहीं जा सकता था। ये द्वारपाल संपूर्ण दिशाओं में तैनात थे। इन द्वारपालों के नाम हैं- नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल। 


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शिव पंचायत -

 देवताओं और दैत्यों के झगड़े आदि के बीच जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता था तो शिव की पंचायत का फैसला अंतिम होता था। शिव की पंचायत में 5 देवता शामिल थे।

ये 5 देवता थे:- 1. सूर्य, 2. गणपति, 3. देवी, 4. रुद्र और 5. विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।


शिव पार्षद -

 जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं ‍उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि ‍शिव के पार्षद हैं।  नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी है और पार्षद भी।

http://shabarmantars.blogspot.com/2017/01/blog-post_30.htmlभगवान शिव के शिष्य - 

शिव तो जगत के गुरु हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले उन्होंने अपना ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया था। सप्त ऋषियों ने शिव से ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और दुनिया के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया।

Friday 20 January 2017

तेतीस कोटि के देवता ,33 types of god

तेतीस कोटि के देवता 



हिन्दू धर्म में तेतीस कोटि के देवताओ का वर्णन पाया जाता है | कोटि के सन्दर्भ में इसका अर्थ करोड़ से लिया जाता है , जबकि यहाँ इसका मतलब प्रकार से है अर्थात तेतीस प्रकार के देवता |अब उन तेतीस देवताओ में किन किन वर्णन पाया जाता है आइये देखते है -

11 रुद्र+12  आदित्य +8  वसु+2 अश्विनी कुमार

शिव के 11 रुद्र अवतार

11  रुद्र  इस प्रकार हैं-
1- कपाली       2- पिंगल             3- भीम            4-विरुपाक्ष      5- विलोहित
6- शास्ता        7- अजपाद          8- अहिर्बुधन्य    9- शंभु           10- चण्ड              11- भव 


 शिव पुराण के अनुसार11 रुद्र अवतार हैं। इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है-
एक बार देवताओं और दानवों में लड़ाई छिड़ गई। इसमें दानव जीत गए और उन्होंने देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। सभी देवता बड़े दु:खी मन से अपने पिता कश्यप मुनि के पास गए। उन्होंने पिता को अपने दु:ख का कारण बताया। कश्यप मुनि परम शिवभक्त थे। उन्होंने अपने पुत्रों को आश्वासन दिया और काशी जाकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना शुरु कर दी। उनकी सच्ची भक्ति देखकर भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हुए और दर्शन देकर वर मांगने को कहा।
कश्यप मुनि ने देवताओं की भलाई के लिए उनके यहां पुत्र रूप में आने का वरदान मांगा। शिव भगवान ने कश्यप को वर दिया और वे उनकी पत्नी सुरभि के गर्भ से ग्यारह रुपों में प्रकट हुए। यही ग्यारह रुद्र कहलाए। ये देवताओं के दु:ख को दूर करने के लिए प्रकट हुए थे इसीलिए इन्होंने देवताओं को पुन: स्वर्ग का राज दिलाया। धर्म शास्त्रों के अनुसार यह ग्यारह रुद्र सदैव देवताओं की रक्षा के लिए स्वर्ग में ही रहते हैं।



12  आदित्य -
 ऋषि कश्यप की पत्नी अदिति से जन्मे पुत्रों को आदित्य कहा गया है। वेदों में जहां अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा गया है, वहीं सूर्य को भी आदित्य कहा गया है। इन्हीं  पर वर्ष के 12 मास नियु‍क्त हैं। 

12 आदित्य  के अलग अलग नाम :
1- अंशुमान       2- अर्यमन       3- इन्द्र             4- त्वष्टा
5- धातु             6- पर्जन्य       7- पूषा              8- भग
9-  मित्र            10-वरुण          11- विवस्वान   12- विष्णु।


कई जगह इनके नाम हैं :
 1- अंश      2- अर्यमा     3- शुक्र             4-     त्वष्टा
5- धाता           6- पर्जन्य       7- पूषा              8-       भग
9-  मित्र            10-   वरुण          11-       विवस्वान   12-     विष्णु।


8  वसु -

1- द्यौ           2- ध्रुव          3- सोम           4- अयज
5- अनल        6- अनिल       7- प्रत्यूष        8- प्रभास

आठों का जन्म दक्षकन्या और धर्म की पत्नी वसु में हुआ था।
शिवपुराण  में इनके नाम द्यौ , ध्रुव, सोम, अयज , अनल, अनिल, प्रत्यूष तथा प्रभास हैं।
 स्कंद, विष्णु तथा हरिवंश पुराणों में इनके नाम घर, ध्रुव, सोम, अप्, अनल, अनिल, प्रत्यूष तथा प्रभास हैं। भागवत में इनके नाम क्रमश: द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु और विभावसु हैं।


वसुओं के बारे में प्रचलित है के उनमे से एक ने वशिष्ठ मुनि की गाय चुरा ली | जब मुनि  को इसी खबर लगी तो उन्होंने सभी वसुओं को मनुष्य जन्म भोगने का शाप दे दिया | वास्तविकता का पता चलने तथा कुमारो के क्षमा मांगने पर पर उनमे से सात की मनुष्य जन्म में आयु एक एक साल तक भोगने का शाप दिया | बाकि बचे एक को सम्पूर्ण मानव जीवन भोगने का शाप दिया | उस वसु का मानव जीवन में महाभारत में राजा शांतनु की पत्नी गंगा के गर्भ से हुआ | आठो का जनम गंगा के गर्भ से हुआ था ,लेकिन वचन में बंधे होने के कारण शांतनु गंगा को पुत्रो को नदी में प्रवाहित करने से  रोक नही सके | सात पुत्रो के गंगा में प्रवाहित करने के बाद गंगा जी को शांतनु ने आठवे पुत्र के समय रोक दिया | और अपना वचन तोड़ दिया | वह पुत्र देवव्रत या भीष्म के नाम से प्रसिद्ध है |


2 अश्विनी कुमार -

 नासत्य,  द्स्त्र  

 अश्विनी देव से उत्पन्न होने के कारण इनका नाम अश्‍विनी कुमार रखा गया  | ये मूल रूप से चिकित्सक थे।   5 पांडवों में नकुल और सहदेव इन दोनों के पुत्र हैं।  कुंती ने माद्री को जो गुप्त मंत्र दिया था उससे माद्री ने इन दो अश्‍विनी कुमारों का ही आह्वान किया था।  दोनों कुमारों ने राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या के पतिव्रत से प्रसन्न होकर महर्षि च्यवन का इन्होंने वृद्धावस्था में ही कायाकल्प कर उन्हें चिर-यौवन प्रदान किया था।  च्यवन ने इन्द्र से इनके लिए संस्तुति कर इन्हें यज्ञ भाग दिलाया था।